उत्तंक और कुंडल
गुरु-सेवा के फल की कथा।
ऋषि उत्तंक ने गुरु की सेवा में कोई कमी नहीं रखी। गुरु ने प्रसन्न होकर गुरु-दक्षिणा माँगी, तो उत्तंक ने राजा की दिव्य कुंडल लाने का वचन दिया।
मार्ग में नागों की सहायता से उन्होंने कुंडल प्राप्त किए और गुरु को अर्पित किए। सीख: गुरु-सेवा और वचन-पालन से सफलता का मार्ग खुलता है।
